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Showing posts from August, 2020

अलफाजों की बातें

आज पहली बार लगा जैसे शायद किस्सों को हर दम सांझा करना भी सही नहीं। आपकी कहानियां आपकी ही परछाई होती हैं, हम दिन भर कहते रहते हैं पर उन अल्फाजों में जो नहीं कह पाते इन पन्नों में पिरोते हैं। आज ऑफिस का काम छोड़ कर वो छोटा सा ड्राफ्ट लिखा था। जो इतने दिनों से मरहम ना मिला मानो उस एक पन्ने ने दिया हो। सब एकदम सही तो नहीं था पर काफी बेहतर सा था।  सोचा था अपने पास ही रहने दूंगी, फिर अचानक से दोस्त का कॉल आया पर मन बेचैन सा था तो उसे कुछ बात हो ही न पाई। काम का बहाना लगा कर मैंने भी फोन रख दिया। पर फिर लगा फोन सही वक्त पर आया है, और कुछ नहीं तो वो आज का लिखा पन्ना ही भेज दूं। वो समझ भी जाएगा और कुछ हद तक जानना शायद उसका हक भी था। तो याद आया कोई और भी है, जिसे वो जानना चाहिए। ईमेल लिखते लिखते लगा, दो और भी दोस्त हैं जिन्हें भेजना चाहिए तो फिर साथ एक और किस्सा भी भेज दिया।  कुछ पल बाद जवाब कि बेचैनी सी होने लगी; पहले बुरा लगा फिर लगा जब इन दिनों मैं खुद, खुद में ही मशरूफ हूं तो उनसे कैसे शिकायत करूं। कुछ पल बाद एहसास हुआ न जाने क्या सोचेंगे, न जाने बेवजह भेजा ही क्यूं...पर फिर इस स

Trying To Hold it Together

माना हर एक Choice मेरा अपना था, पर कभी कभी आज जैसे दिनों पर लगता है पता नहीं होगा भी या नहीं। Usually, लोग first semester main confused aur last semester में sure होते हैं। But, life के ज्यादातर decisions की तरह इस area में भी उल्टी निकली। First में Convinced and last में Super-confused.  पिछला एक साल किसी तरह निकल गया था but last कुछ एक महीने (the post Covid, lockdown वाले); honestly पता नहीं...Almost like best भी थे और worst and toughest भी। क्या करना है? पता नहीं! शायद अब कुछ समझ आने लगा था, खूब मेहनत करी पर सब postponed। अब लगता है जैसे थक सी गई हूं। बस rest करना चाहती हूं and अभी बस वही नहीं कर सकती। अगर किसी दिन distract हो कर extra videos और movies देख लूं, तो ऑफिस का सारा काम रह जाता है and consequently पढ़ाई और तैयारी तो भूल ही जाओ। कभी कभी लगता है I just wanna breathe and relax फिर डर भी लगता है कि सब करने के बाद मैं last moment कहीं फिर से सब गड़बड़ ना कर दूं। सच कहूं तो मुझे ये नहीं पता finally चीजें थोड़ी सी ट्रैक पर कब वापिस आएंगी पर बस अब ये पता है मैं अपनी त

Lessons I still can't unlearn

कभी सर्वधर्म स्कूल में मेरी Moral Science का हिस्सा था Secularism मेरे देश का गौरवान्वित किस्सा था पर मानो आज 1947 जैसे फिर हिन्दू मुस्लिम में बंट गए कुछ bhakt, तो कुछ Anti-national के tag में लगे हुए अचानक दोस्त के जनाजे में शामिल हिन्दू आज खल रहा एक नमाज़ी क्यूं हिन्दू शादी में आता अखर रहा

Is it really equal to be a man/woman in today's world?

Disclaimer - Not my usual drafts on random things. You may find the write-up a little disturbing due to the language, read at your own risk.  You call "Feminists" unnecessary, men are struggling too no doubt, but on the overview, "Is it really so same to be a man or to be a a woman  in this world?" But, before we can get into the nitigrities,  I feel it was imperative to state that this article by no means intends to portray women are always right, men don't face sexual abuse or all men are the same or any such generalisations. But, a subtle diffqerence in our experience that I simply couldn't ignore.  I was recommended recently to watch "Paatal Lok" on Prime as it apparently quite aptly portrays on how being in the media really feels like and how the industry often functions.  But, as I was only a couple of episodes down, a part particularly struck me making me pause to pick up the keyboard. Part of the plot that inspired t